Sunday, August 3, 2014

Every Temple have a story to say

कुण्डेष्वर

जीवन में यदि आस्था को माना जावे तो हर पत्थर में भगवान की मूर्ति होती है। हमारे पूर्वज षायद हमारी पीढ़ी से ज्यादा समझदार रहे होगे तभी उन्होने श्रद्धा के साथ जीवन जीने की षैली विकसित की थी। इस का परिणाम था कि भगवान को स्वर्ग से उतार कर मंदिरो में स्थापित कर दिया। हर मंदिर की एक कहानी कही जाने लगी तथा यह कहानी पीढ़ी दर पीढ़ी हर बच्चे के बचपन में ही अवचेन में इतनी गहराई से डाल दी जाती है कि उन की सत्यता या एतिहासिकता पर सवाल उठाने का प्रष्न ही उद्भूत नही होता। हर वुजुर्ग अपनी सनतान को यह कहानियां इतनी तन्मयता से सुनाता है कि जैसे वह घटना उसके समाने ही घटी हो। हमारे प्रत्येक मंदिर का इतिहास आस्था पर ही निर्मित है। यह इतना रूमानी है कि जब हम मंदिर जाने की कल्पना भर करते है हमारे अंदर कही कुछ बदलाव आ जाता है। तनाव हम मंदिर की घंटी बजाते ही हवा में उड़ा देते है और यदि न उड़े तो मुर्ति के सामने नतमस्तक होते ही उसके चरणों में अर्पित कर निष्चित घर लौट आते है। लेकिन जिन की पढ़ाई एवं परिवरिस तर्क आधारित व्यवस्था में होती है उन्हें बात गले नही उतरती। इसलिए जब वे मंदिर जाते भी है त बवे इस लाभ से बंचित अपनी समस्याओं के साथ संषयग्रस्त मन से ही घर लौट कर नींद की गोली खाने पर ही सो पाते है। 

प्रतिवर्ष संकृति, वसंत पंचमी तथा कार्तिक एकादषी पर आप यदि सौभग्यवष कुण्डेष्वर की यात्रा पर आये तो आप यह प्रत्यक्ष देख कर हतप्रभ हुए नही रह सकते कि आज भी हमारे हजारों ग्रामीणजन किस श्रद्धा के साथ षिवलिंग पर माथा टेकते है। इस भीड़ के पास कुछ कम वस्तुऐं हो सकती है लेकिन इन के मन में भगवान के प्रति अपार श्रद्धा है। कुण्डेष्वर जैसे स्थान को यही श्रद्धा तीर्थ बनाती है। बैलगाड़ी की सवारी का मजा तभी है जब आप इसमें बैठ कर मेला देखने जा रहे हो। टीकमगढ़ से ललितपुर रोड़ पर 5 किलो मीटर दूर कुण्डेष्वर स्थित है। यह स्थान जमड़ार नदी के किनारें बसा है। इस स्थान की भी एक कहानी है जो यहां के लोग बड़े चाव से सुनाते है। पौराणिक काल में पास के नगर बांनपुर में बाणसुर राजा का राज्य था। इसकी बेटी उषा अति सुन्दर थी। बहुत से राजकुमार इससे षादी करनर चाहते थे। लेकिन उषा का बिवाह श्री कृष्ण के नाती अनिरूद्ध से हुआ था जो प्रद्युमन का अति सुन्दरए बलसाली पु़त्र था। उषा षिव भक्त थी उसे एक रात स्वप्न में भवान षिव ने बताया कि वह जमड़ार नदी के प्रपात के उपर बने कुण्ड में बास करते तथा उषा वहां उनके दर्षन तथा पूजा के लिए आ सकती है। उषा एक रात अकेले घना खैर का जंगल पार कर कुण्ड पर पहुची जैसे ही उसने पानी में पांव रखा कुण्ड का जल दो भागों में बट गया। उषा के लिए जैसे ही जल ने मार्ग दिया वह कुण्ड के अंदर चली गई। वहां उसे एक विषाल षिव लिंग के दर्षन हुए। सेवा पूजा कर उषा सूर्योदय के पूर्व अपने पिता के घर लौट गई। अब उषा  का यह प्रतिदिन का काम हो गया था कि रात को बह जंगल पार कर कुण्ड में जाती तथा सुबह होने के पूर्व लौट जाती। एक दिन उषा के पिता को नींद नही आ रही थी औ वह अपने महल की छत पर टहल रहा था। तभी उसने अपनी बेटी को श्रृंगार कर महल के बाहर अकेले जाते देखा। षक होने पर उसने कुछ दूरी बना कर उसका पीछा किया। उसे यह देख कर आष्चर्य हुआ कि कैसे कुण्ड के पानी ने उषा को राह दी तथा बह कुण्ड के अंदर चली गई। जब उके पिता ने अंदर जाने की कौषिष की तो पानी ने उसे राह नही दी। पिता ने कौतूहल व आष्चर्यवष यह निर्णय किया कि बह कुण्ड के किनारे ही बेटी का इंतजार करेगा। वह तट पर खड़ा रहा। सुर्योदय के पूर्व उसेने देखा के उसकी बेटी कुण्ड से बाहर आ रही है। उसने अपनी बेटी से जानना चाहा कि यह सब क्या है। पहले तो उषा ने बात टालनी चाही लेकिन बहुत हट करने पर उसने पिता को पूरी बात बता दी। पिता ने निष्चय किया कि बह षिव का तप कर उने दर्षन अवष्य करेगा। तब बाणसुर नं एक पैर पर खड़े हो कर सालों षिव की तपस्या की। षिव के प्रषन्न होने पर उन्होने बाणसुर को दर्षन दिये तथा वरदान मागने का आग्रह किया। बाणासुर पे कहा कि लोकहिताय आप कुण्ड के बाहर लिंग स्थापित करे तकि आम जन दर्षन का लाभ ले कर जीवन धन्य कर सके। षिव ने उसकी इच्छा की पूर्ति की तब उसने बहां विषाल मंदिर तथा कुण्ड का निर्माण करवाया। 
लेकिन कालान्तर में वह मंदिर भूगर्भ में चला गया तथा बस्ती उजड़ गयी। लोग धीरे-धीरे यह भूल गये कि बहां कोई षिव मंदिर भी था। कुछ सालों के बाद बकरी तथा भेड़ पालक खटीक जाति के चरवाहें उस स्थान पर बस गये। एक दिन एक महिला अपनी औखली में धान कूट रही थी तथा लोकगीत गाते-गाते जोर-जोर से मूसल चला रही थी। जब उसने आदतवष धान को एक किनारे से बीच में करने के लिए उखल में हाथ डाला तो बह खून से लाल हो गया। बह महिला बहुत धबड़ा गई। उसने जब परिवार के लोगो को बुला कर दिखाया तो सब डर गये और औखली को मिटृटी के कूड़े से ढक दिया। बाद में उस महिला को षिव ने स्वप्न दिया तब उसने उस कूड़े को हटा कर षिवलिंग को बाहर घरवालों की मदद से निकाला। सब ने मिल कर एक मंदिर का निर्माण किया तथा षिवलिंग को कूड़ादेव पुकारने लगे जो बाद में चलते चलते कुण्डेष्वर हो गया। बाद में बुन्देला राजाओं ने इस जगह भव्य मंदिर, प्रांगण, भवन, बगीचा, कुण्ड तथा सड़क का निर्माण करवाया। जन मानस में तभी से इस मंदिर के प्रति अपार श्रृद्धा है। षिव को लोग बेल, घतूरा, नरियल तथा फूल पत्ती दूब तथा पानी या दूध से पूजा करते है। नदी का कुण्ड झरना तथा नदी किनारे के पेड़ तथा उन पर कूदते बंदर एक रमणीक बातावरण का निर्माण करते है।        

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